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रेल
रेल की बोगी मानों घरों को खोलकर जोड़ दी गयी एक श्रृंखला होती है, जो एहसास कराती है की मंज़िल
बरसने लगूं बेपरवाह
ख़्वाबों की गलियों में टहलने निकली ही थी की अल्लहड़ बूंदों की तीखी आवाज़ सुन हड़बड़ाई आँखों ने द्वार जो
कहां हैं वे फूल, वे किताबें कहां हैं?
एक शायर ने लिखा था, “अब के बिछड़े हम शायद ख्वाबों में मिले, जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में