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मैं इतनी सार्वजनिक हो गई
मैं इतनी सार्वजनिक हो गई की मझे मेरे से बहार सब पहचानने लगे| क्या करूँ? वक़्त की कोई खाली अंगुली
स्त्री
पुरुष जब घर से दूर होता है तो फ़ोन करके पूछता है कि गेट का ताला लगा लिया ना।
शब्दों के अंबार
मैं कागज़ ले के बैठी हूं, शब्दों के अंबार से कुछ अपने लिए बिन रही हूं। शब्द बहुत ज़्यादा