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रिश्तों को सिलने की ज़रुरत है
एक छोटा बच्चा था। कोई नौ – दस साल का। अपनी छोटी बहन का फटा जूता मोची के पास लेकर
जीवन की धुप छाँव में जीवन संगिनी का समर्पण
यूं ही सुबह होती है और यूं ही हो जाती है शाम। ज़िंदगियां यूं ही चली जा रही हैं। एक
गुनगुनी धूप, गुनगुनाता मन !
गुनगुनी धुप, गुनगुनाता मन छांव शरारती, इठलाता तन !! गुलाबी शहर में गुलाबी सर्दी दस्तक दे चुकी है। खिड़की