एक शायर ने लिखा था, “अब के बिछड़े हम शायद ख्वाबों में मिले, जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिले “। दरअसल यह ग़ज़ल उस गुजिश्ता ज़माने की यादगार ग़ज़ल है, जब फूल खिलते