इंसानी वजूद में ना जाने कितने रंग के कितने ही धागे हैं जो अंदर ही अंदर आपस में उलझ-सुलझ कर इंसान के बाहरी किरदार पर असर डालते हैं। जिन धागों को कबीर से जुलाहा मिल