मैं कागज़ ले के बैठी हूं, शब्दों के अंबार से कुछ अपने लिए बिन रही हूं। शब्द बहुत ज़्यादा हैं, खुद को खोया हुआ पाती हैं। जैसे मेले में खड़ी एक छोटी बच्ची। बस