Blog

- 86 Views
- March 12, 2026
लफ़्ज़: मन से काग़ज़ तक की यात्रा
एहसास की मुंडेर से उड़ते लफ़्ज़ एहसास कि मुंडेर को लांघकर लफ्ज़ जब हवा में शामिल होते हैं … कानों में घुलते से चले जाते हैं और कागज़ कि सतह चूमते हैं तब अनेक खूबसूरत

- 173 Views
- December 1, 2025
दबी छिपी ज़िन्दगी में रवानी का रविवार
ज़्यादा पुरानी बात नहीं है, कुछ साल ही तो हुए हैं। बस्तियां इस तरह फ़ैल गयी हैं दूर दूर तक, हर कहीं -हर जगह। एक दिन सोंचा चलो अपने शहर के नए तेवर ही देख

- 170 Views
- November 22, 2025
दीवार में एक खिड़की रहती है
घरों या फ्लैटों का विज्ञापन करने वाले लोग अक्सर उसके गुसलखाने या रसोईघर की सुविधाओं का बखान करते हैं। पर उन्हें यह भी बताना चाहिए की कमरे में खिड़कियां कहां हैं, क्यूंकि जिस कमरे की

- 105 Views
- November 21, 2025
अपने नाश्ते को नमन करें
जिन्हे ख्यालों को समझाना, अच्छा खाना खाना, खुले दिल से ठहाके लगाना पसंद हो वे बड़े दिलचसप होते हैं। यूँ भी जब हम कोई त्यौहार या किसी विशेष अवसर का जश्न मनाते हैं तो बढ़िया

- 102 Views
- November 18, 2025
पुराना शहर – किसी पुरानी फोटो एलबम सा `
बीती सदियों कि बसाहटों कि जड़ें बेहद गहरी होती हैं। तहज़ीब इनके वजूद में महकती है और रिवाज भी इन्हे पहचानते हैं। शहर का दिल अक्सर उसके बीच में ही होता है, जिसे हम-आप पुराना

- 150 Views
- November 17, 2025
प्रेमचंद की बीते कल की कहानियां आज का किस्सा क्यों बनी हुई हैं?
बचपन में प्रेमचंद की कुछ कहानियां हम सबकी हिंदी की किताबों का हिस्सा ज़रूर रही हैं। उस वक़्त वो लम्बी कहानियां बोर लगा करती थीं। इतने गहरे भाव, वो भी इतनी शुद्ध हिंदी में हम

- 134 Views
- November 15, 2025
Nothing Makes Me Happy Anymore
Am I Depressed? Here’s Why & What to Do Are you also thinking “Nothing makes me happy any more…” ? Darling, we are together in this. Yes, believe me, more than half of the planet

- 120 Views
- November 14, 2025
Imaginary friend
The Silent Companion Guiding Our Choices We all have that one imaginary friend. As adults we think children crave for it more but with delayed realisation, we all realise the presence of a special friend

- 111 Views
- November 13, 2025
सालों को सवांरने कि कोशिशों में तारीखें बिगड़ गई
सालों को सवांरने कि कोशिशों में तारीखें बिगड़ गई और साल, वो तो खूंटियों पर टंगे कैलेंडर से नीरस होने लगे हैं। यादों के जो फूल कभी उस सफ़ेद तकिये के नीचे रखे थे, उसमे

- 107 Views
- November 12, 2025
बैडरूम की खिड़की
मैं अपने बैडरूम की खिड़की से नीला आकाश, दूर तक फैले पहाड़, नीचे वादी में बहती नदी और दूर एक टीवी टावर देख पा रहा हूं। मैं अपनी खिड़की में बैठकर पुराने हिंदी फिल्मो के