Posts by: Urvi
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- Urvi
- October 3, 2020
बरसने लगूं बेपरवाह
ख़्वाबों की गलियों में टहलने निकली ही थी की अल्लहड़ बूंदों की तीखी आवाज़ सुन हड़बड़ाई आँखों ने द्वार जो खोले तो स्वागत हुआ उस नमी से जो भाप बनकर खिड़की पर बन फिसल रहे
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- Urvi
- October 2, 2020
कहां हैं वे फूल, वे किताबें कहां हैं?
एक शायर ने लिखा था, “अब के बिछड़े हम शायद ख्वाबों में मिले, जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिले “। दरअसल यह ग़ज़ल उस गुजिश्ता ज़माने की यादगार ग़ज़ल है, जब फूल खिलते
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- September 26, 2020