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वहाँ जहाँ शब्द ना हों
मौन, वहाँ जहाँ शब्द ना हों। यह ज़्यादा प्रभावी अवस्था है। यूँ शब्द भी यहीं से निकलते हैं। साधारण
ज़रा देखिये तो, यह जीने का अंदाज़ कुछ नया – नया सा है
उस थमे हुए दौर से सब ऊब ज़रूर रहे थे, पर क्या केवल ऊब ही हाथ लगी है? कुछ
“किसने कितनी बात मानी”
हमारा व्यक्तित्व किस तरह का है? कैसी सोच रखते हैं हम? हमारे आसपास का, हमारे शहरों का, गावों का, कस्बों