ज़रा देखिये तो, यह जीने का अंदाज़ कुछ नया – नया सा है

उस थमे हुए दौर से सब ऊब ज़रूर रहे थे, पर क्या केवल ऊब ही हाथ लगी है? कुछ महसूस भी तो किया है। कुछ सीखा, कुछ अनुभव भी तो किया है। चलिए एक नज़र डालते हैं उस वक़्त पर जो हमने #lockdown में घर पर गुज़ारे हैं।
बारीकी से देखना सीखा
खिड़की, बालकनी या छत पर से प्रकृति के नज़ारों से एक नयी मुलाकात की। ऐसी मुलाकात जो इत्मीनान लिए थी क्यूंकि हड़बड़ाहट अभी छुट्टी पर है। हवा के झोंको को पेड़ों की पत्तियाँ सहलाते हुए देखा। आसमान के कैनवास पर बादलों को आकृतियाँ बनाते हुए देखा। असल में यही छोटे – छोटे पल हमे जीना सिखाते है। पौधे की एक कली फूल बनने के लिए कितने आकार बदलती है, चिड़ियों की सुरीली हलचल, शामें एक तस्वीर लिए जो कल की शाम से जुदा थी और कल की शाम से भी जुदा होंगी। ये सब समय को बीतने का तरीका भी है। हर चीज़ को एक बच्चे की तरह कौतुहल भरी निगाहों के साथ बारीकी से देखना हमने फिर से सीखा है। अपने ही घर को इतना नज़दीक से हमने पहले कब जाना था।
घर में शाक – सब्जी उगाई
पहले कभी आँगन या बालकनी में धनिया, पुदीना, पालक, टमाटर, मिर्च वगैरह उगाने का ख्याल शायद ही कभी आया हो। पहले के लोग घरों में ही थोड़ी बहुत फल – सब्जियाँ उगाई करते थे। और इसलिए स्वस्थ भी रहते थे। पर आज इनकी देखभाल के लिए न तो किसी के पास वक़्त है और ना मन। पर इस lockdown में अनेकों व्यंजन , पापड़ और अचार भी घर में बन रहे हैं। अब इस प्रकार के भोजन में आनंद अनुभव कर रहे हैं।
प्रकृति और करीब मिली
दूर – दूर से हिमालय दिखने की फोटो और वीडियो देखे ही होंगे। पहले घर के नज़दीक होते हुए भी कई मंज़र नहीं दिखते थे, पर अब दिखाई देने लगे हैं।
रात की ठंडक को महसूस करने छत पर टहलने को तरजीह देने लगे हैं। पौधों की पत्तियों पर फिसलती बूंदों को देख कर प्रफुल्लित होने लगे हैं। उनके नीचे उगते छोटे पौधे भी लुभा रहे हैं। नन्ही कोंपलों को और पत्तियों की फिसलपट्टी पहले कब देखी थी ?
उनकी मानी एहमियत
इस वक़्त वो सभी ऊंची दुकाने बंद रही जिनके लिए हमने स्थानीय दुकानों से सामान खरीदना बंद कर लिया था। उस कठिन समय में छोटी राशन की दुकानें और सब्जी वाले ठेले ही हमारी ज़रूरतों को पूरा कर रहे थे। आज उनकी एहमियत और ज़रुरत हम समझ रहे हैं। बाजू , पड़ोस के दूकानदारों से संवाद और लेन-देन बढ़ा है।