ख़्वाबों की गलियों में टहलने निकली ही थी की अल्लहड़ बूंदों की तीखी आवाज़ सुन हड़बड़ाई आँखों ने द्वार जो खोले तो स्वागत हुआ उस नमी से जो भाप बनकर खिड़की पर बन फिसल रहे