आपका नज़रिया आपका मानसिक चश्मा है

आपका नज़रिया आपका मानसिक चश्मा है। आप उसी से जिंदगी देखते हैं। जिनके चश्मे साफ़ हैं उन्हें जिंदगी साफ़ दिखती है। अगर ये चश्मे साफ़ नहीं हों तो जिंदगी गन्दी दिखेगी। ” मैं बस आँखों – देखी पर भरोसा करता हूँ “, बेकार मिसाल हैं यह। इसको ऐसे समझें की ” जब हम विश्वास करेंगे तब ही दिखेगा “। क्यूंकि हमें वही दिखता है जो हम देखना चाहते हैं। और हम भी क्या ही कर लें, इतना वजन जो ढोए रहते हैं, दिल में , माथे में, ऐसे में हमारी आँखें फुल – टाइम जॉब कर ही नहीं पाती।
परेशानी को देखने का तरीका ही परेशानी है। हमे नए नज़रिये की ज़रुरत है। हमेशा एक बेहतर तरीका होता है। इसके लिए हमे अपने अहम को संतुष्ट करने के लिए गैर ज़रूरी कोशिशों से खुद को आज़ाद करना है। हम चीज़ों को फिर से व्यवस्थित करें। हमेशा मैं , मैं , मैं चीखना बंद करें। हम ग़लतियाँ नहीं रोक सकते लेकिन उनका दोहराव रोकना बेशक हमारे ही हाथ में है।
दो चीज़ें हैं , चिंता और प्रभाव। चिंता यह है कि सबको शिक्षित होना चाहिए तभी अच्छे दिन आएंगे। प्रभाव यह सुनिश्चित करना है कि घर पे काम करने वाली कि बेटी कि शिक्षा का खर्च हम उठाएं। चिंता यह है कि ” लोग ऐसे क्यों हैं ?” और प्रभाव यह है कि “मैं वह बदलाव बनूँगा, जो मैं देखना चाहता हूं।”
बताइये ज़रा, कौन सा अच्छा लगा? क्या आपको चश्मा साफ़ करने कि या पूरा चश्मा बदलने कि ज़रुरत महसूस हुइ ?