बच्चे सिखाएं, हम सीखें

नन्हे – मुन्ने बेख़ौफ़ जीते हैं। सकारात्मकता में भी इनका कोई सानी नहीं। बालपन के इस सबसे बड़े गुण को बचपना समझकर भुला देना नुकसानदेह है।

बच्चों को कागज़ देकर उन्हें रंगों से, लकीरों आकारों से खेलते देखना पसंद है। बच्चे जिस बेफिक्री से पेंसिल चलाते हैं, जिस बेख़ौफ़ तरीके से चित्र गढ़ते हैं, वो बड़ों के बस की बात नहीं।

इसे हम आजकल डूडल ही कहते हैं।  डूडल यानी सदृश वस्तुओं के मनमाफिक रेखाचित्र बनाना। यह आजकल दफ्तरी प्रेजेंटेशन में ही नहीं , डायरियों में दर्ज यादों और योजनाओं में भी बेहद कारगर सिद्ध हो रहे हैं।  इनको सीखने – सिखाने के हज़ारों ज़रिये इंटरनेट पर भी मौजूद हैं। 

बच्चों के सृजन में उन्मुकतता कैसे आ जाती है? बड़ों में ये क्यों नहीं होती, अगर इस सवाल पर विचार करें तो शायद जवाब मिले की बच्चे किसी की राय में फिट होने या किसी को प्रभावित करने के लिए कुछ नहीं करते।

वे जो बनाते हैं उसमे प्रयोग करने की अदम्य चाह छुपी होती है। इसलिए कभी लकीर खींचते – खींचते गोलाकार कर देते हैं, तो कभी चक्र से रेखाएं बाहर ले जाते हैं। उनकी पेंसिल बेशक कागज़ के टुकड़े पर चल रही होती है, लेकिन उनका मन सृजनाकाश के विस्तार में होता है। सोंचकर कोने नहीं भरते वे।

छोटे से कागज़ पर वे वो रचते हैं, जो बड़े से बड़े कैनवास पर कोई नहीं रच सकता। 

ये यूँ भी समझे की अगर बच्चे किसी पिजरे में कैद पंछी को देखते हैं, तो उनकी नज़र पिंजरे पर कम, पंछी पर ज़यादा होती है। हम बड़े पिंजरे की सीमाओं में उलझकर पंछी से सहानुभूति रखते हैं वहीँ बच्चे पंछी के सौंदर्य और उसकी आदतों को समझने में व्यस्त हो जाते हैं।

भय, झिझक, नापे जाने की आशंका, तुलना की झेंप वो पिंजरे हैं, जिनमे हमारी सकारात्मकता कैद है।


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