कड़वाहटों में मीठा

फ़िज़ा में तैरती कड़वाहटों में मीठे की तलब और तेज़ हो गयी है। कानों से आह निकलने लगी है नकारात्मक सुनते – सुनते। और फिर जैसे उन बातों से मुँह का रास्ता चुन लिया बाहर निकलने के लिए। खुद की जबान कब इतनी कड़वी हो गयी यह पता तब चला जब इसका स्वाद आने लगा। और तब जाकर मीठे की याद आयी। यह इतना पसंद है की मन करता है की मुँह के साथ आँखों और कानों से भी इसका स्वाद लूं।
हाँ बिलकुल, ज़्यादा तो हानि ही करेगा पर अब इस मौसम में ज़्यादा मात्रा में यह पाया भी नहीं जाता। इसलिए शरीर में इसकी अधिकता होने की गुंजाइश भी कम है। पर इतना ज़रूर मौजूद है की हमारा स्वास्थ बना रहे। तो आइये ना, मीठा ढूंढते हैं और बाँटते हैं।