जिंदगी भी कभी सर्द हाथों से छू लेती है

आह, वह! जाड़े के क्या कहने!

सर्दियां आ गयी हैं। व ऋतू , जो सबको प्रिय होती है। इस बार कुछ अलग बात ज़रूर है, लेकिन जाड़ा तो फिर जाड़ा है। ये जो आयी हैं सर्दियां, इस बार कुछ अलग रंग लेकर आयी हैं। जीवन शैली तो यूँ भी पिछले आठ-दस महीनों से बदल चुकी है, लेकिन सर्दियों में कुछ ख़ास है।  

ये कैसा जाड़ा आया है, जिसमे किसी भी बच्चे को रज़ाई खींचकर उठाना नहीं पड़ रहा, किसी भी बच्चे को बेमन से, नींद में झूलते हुए सुबह बस स्टॉप पर नहीं पहुँचाना पड़ रहा, किसी माँ को मुंह अंधेरे उठकर नाश्ता नहीं बनाना पड़ रहा? मानो, पहली बार जाड़ों ने कहा हो, जाओ, इस बार सुबह की नींद को बख्शा। इस दौर का हर मौसम अजीब रहा है। गर्मियों और बारिश को तो रोका-संभाला जा सकता था, लेकि सर्दियों की छुअन से किसी को छूट नहीं। ठंडी अहवा खिड़की, दरवाजे, रोशनदान के सारे राज़ खोल देती है। ज़रा-सी झिर्री भी बच नहीं सकती। वहीं धुप की रहें घर में कहाँ सहल हैं, इनका भी हिसाब साफ़ हो जाता है। रौशनी और गर्माहट के स्वागत और सर्द शुष्क मिज़ाजों को दूर रखने का सन्देश छुपा है मौसम में। 

धुप अच्छी लगने लगे, तो समझो जाड़ा आ गया है। जिंदगी भी कभी सर्द हाथों से छू लेती है, तब गुनगुने अहसासों की क़द्र समझ में आती है। सर्दियां जैसे उस इत्मीनान की याद दिलाने आती है, जो रिश्तों की उष्मा में छुपा है।    

Comments (0)

  1. Ishita bindra

    03 Dec 2020

    Superbly written

  2. Urvi

    08 Jan 2021

    Many Thanks 🙂 Keep dropping in yours #kahanigram 🙂

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