ये फुहारों के रियाज का समय है

ये फुहारों के रियाज का समय है।
सूखा देने वाली गर्मियां विदा हुई। वही जो मिटटी, गाला, मन….. सब सूखा देती हैं। सब झुलसने लगता है, स्वभाव भी, विचार भी। अब समय है फुहारों के राग के रियाज का। पेड़ – पौधे टकटकी लगाए आसमान को देखते हैं।
हम मानव तो घर, कमरों में ठंडक की आड़ ले लेते हैं पर यह विचारों में ताज़गी नहीं रख पाता। पर पेड़ कभी पलायन नहीं करते, क्योंकि उन्हें भरोसा है की तपिश के बाद राहत भी झमाझम बरसती है। और बारिश का सबसे ज़्यादा मज़ा भी वही लेता है जिसने जमकर पसीना बहाया हो।
खुश होती, झूमती प्रकृति को महसूस करने के लिए थोड़ा – सा समय तो देना ही होगा। जब बूंदों की महफ़िल सजती है, ‘उर्वी’ को श्रृंगारित होता देखने में जो मज़ा है वह उसे दुल्हन बनता देखने से कई गुना ज़्यादा है।
बरखा का ये समय बेहद अनुकूल है हमारे तन, मन, विचारों के भीगने के लिए। ये सब हमारे ही तो हैं, इन्हे भिगोना है, सुखाना है, तेह करके संदूक में रखना है, या पुराने होने पर घर की पिछली दीवार की रस्सी पर टांग देना है, ये हमे ही तय करना है। मेरे ख्याल से हमे जिंदगी में जमीं बकवास की परतों को प्रकृति के इस श्रृंगार रस में भिगाकर धो लेना अच्छा रहेगा।
प्रकृति हमारे लिए ही सजती है, संवरती है, संवारती है। थोड़ा गौर से देखिएगा, जब आपकी नज़रें उसे निहार रही होती हैं तो वह ख़ुशी से शर्माने लगती है। इस ताज़गी भरे मौसम में जिंदगी की मिठास छिपी है।
अब की ध्यान रखियेगा, बारिश में घर की खिड़की बंद नहीं करेंगे। फुहारों से घर के और मन के द्वार खोल के पूरे आँगन को भीगने देंगे। इस अद्भुत श्रृंगार को ज़रूर देखेंगे। उसके अहसास में नहाएंगे। एक बार यह करके तो देखिए, आपके जीवन के आँगन में यह सुखद परम्परा अंकुरित होगी जिसकी जड़ें घर-घर होते हुए पूरी ‘उर्वी’ में फ़ैल जाएँगी।