आखिर क्यों हैं हम इतने बेसब्र

आइये, वक़्त का पहिया थोड़ा पीछे घुमाते हैं, मिलने चलते हैं उस पुराने बीते हुए समय को जहां से हम होकर निकले हैं। इत्मीनान की गलियों में घुमते हैं। ज़रा सोंचिये, इन सबके जिक्र मात्रा से हम कितने खुशशक्ल लग रहे हैं। फुर्सत में छिपे परवाह के आलम में। प्रकृति की सोहबत में। काम तब भी पूरे होते थे। या यूँ कहें की काम तुरंत पूरा होने की हमे जल्दी नहीं होती थी। फिर भी सब मुकम्मल होता था। प्रकृति को ही देख लीजिये, वह ज़ल्दबाज़ी नहीं करती, फिर भी सब पूरा होते रहता है। विशाल फैली हुई पृथ्वी जिसका नियम ही बदलते जाना है, वह भी सहेज गति से काम करती है तो हम तो उसके सामने इतने सूक्ष्म! हमे इतनी बेसब्री क्यों है? इसी रवैये की वजह से हम कितने ही छोटे किन्तु ख़ुशी भरे पल अनदेखा कर देते हैं।
हां, गतिशीलता कई सन्दर्भों में अच्छी और सराहनीय ज़रूर है पर वह सब्र के साथ होनी चाहिए। धैर्य, यह केवल शब्द बनकर रह गया है, व्यवहार से लगभग लुप्त हो चूका है। बेसब्री के रथ पर सवार रहने से हम उस ख़ुशी को भी संपूर्ण नहीं जी पाते जिसके लिए हमने अनेक पलों की कुर्बानी दी है। कहते हैं साबरा का फल मीठा होता है, पर यहां तो आलम ये है की हम कच्चे फलों को ही तोड़कर, उसमे इंजेक्शन लगा कर उसे बड़ा कर देते हैं जिसमे मिठास वास नहीं करती। तो फिर मीठे का स्वाद शायद हम भूलते तो नहीं जा रहे, इसलिए भी सब्र का मीठा फल कैसा लगता है इस तरफ हमारा ध्यान ना जाना स्वाभाविक है।