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- December 25, 2020
आवाज़ों, खुशबुओं और यादों को कैसे मिटा पायेगा कोई
आवाज़ों, खुशबुओं और यादों को कैसे मिटा पायेगा कोई। यादें बसी रहती हैं। किसी सामान में, किसी जगह पर, किसी हरकत में … यादें जम जाती हैं। जब हम टूटे – फूटे घरों की कतारें
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- December 24, 2020
ये खतरनाक कशमकश
ये कशमकश बेहद खतरनाक लगती है। दबी हुई छाती महसूस होती है। सांस लेने में तकलीफ़, शरीर सामान्य से थोड़ा ज़्यादा गरम और धीरे-धीरे बढ़ता हुआ सिरदर्द। अपनी पल्स मैं बिना स्टेथोस्कोप के सुन पा
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- December 23, 2020
एक अचूक औषधि!
वादा निभाकर वो फिर आयी कई मीलों का सफर तय करते हुए अनंत आकाश में टहलते हुए घने बादलों से हाथ छुड़ाकर, सीधे मुझसे मिलने ‘उर्वी’ का रुख करती। मैं ज़रा दूर रहती हूं, सो
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- December 22, 2020
क्यों हैं हम इतने बेसब्र?
क्यों हैं हम इतने बेसब्र? आईये, वक़्त का पहिया थोड़ा पीछे घूमते हैं, मिलने चलते हैं उस पुराने – बीते हुए समय को जहाँ से हम होकर निकले हैं। इत्मिनान की गलियों में घूमते हैं।
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- December 21, 2020
आज बहने दिया
बहुत दिनों से बांध रखा था, आज बहने दिया। दो काम एक साथ हो गए, आँखों कि मदद से दिल हल्का हो गया, मन की जमीन भीगी और आंधी थम गई एक बार फिर। बहा
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- December 20, 2020
इंसानी वजूद
इंसानी वजूद में ना जाने कितने रंग के कितने ही धागे हैं जो अंदर ही अंदर आपस में उलझ-सुलझ कर इंसान के बाहरी किरदार पर असर डालते हैं। जिन धागों को कबीर से जुलाहा मिल
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- December 19, 2020
जो ऋतु वसंत नही हो पाई, वह ऋतु होने से चूक गई
वसंत जो ऋतु वसंत नही हो पाई, वह ऋतु होने से चूक गई है, उसके स्वभाव से अलग हो गई है। जीवन के रस में, जीवन के रास में, जीवन के छंद में, जीवन
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- December 18, 2020
मैं इतनी सार्वजनिक हो गई
मैं इतनी सार्वजनिक हो गई की मझे मेरे से बहार सब पहचानने लगे| क्या करूँ? वक़्त की कोई खाली अंगुली पकड़ लूँ| कई बार शब्द पकड़ा तो अर्थ ही छूट गया| अभी उन लम्हों को
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- December 17, 2020
स्त्री
पुरुष जब घर से दूर होता है तो फ़ोन करके पूछता है कि गेट का ताला लगा लिया ना। वहीं स्त्री पूछती है, खाना खाया कि नही, क्या क्या खाया ? तनाव में उनके
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- December 16, 2020
शब्दों के अंबार
मैं कागज़ ले के बैठी हूं, शब्दों के अंबार से कुछ अपने लिए बिन रही हूं। शब्द बहुत ज़्यादा हैं, खुद को खोया हुआ पाती हैं। जैसे मेले में खड़ी एक छोटी बच्ची। बस