पेड़ों को सहलाती बारिश

रिमझिम के गीत सावन गाए 

 कायनात को नहाते हुए देखना जितना सुखद है उतना ही सुहावना है बारिश के बाद का बंधा समा   

बारिश कि बूंद जैसे पत्तों के बदन पे लटके हुए मोती

पेड की पत्तियों से फिसलती शरारती बूंदों की खिलखिलाहट में पायल की सी खनक होती हैं।

बारिश आती हैं तो दिल की मिट्टी भीग जाती हैं।

हम सब एकबारगी अपनी खिड़की से बाहर देख लेते हैं, फिर भूल जाते हैं, और वो सब कुछ भिगोती रहती हैं। मानो आयी ही हो नया रचाने, हरा भरने।

काश! हम बारिश से हो पाते! बूंद–बूंद में अस्तित्व को संभालना जानते। किसी के बुलावे की राह देखे बगैर, बिना किसी अहम के, बस आ जाते। भीगी मुस्काने संजो लेते।

और,
गति पर इतराते मानव को बता देते की कभी थम जाना भी पड़ता हैं।

आह! क्या महक है … तेरे भीगे बदन की, मन करता है शीशी में संजो कर रख लूं अपने पास …. फिर बूंद – बूंद छिड़कूं उस रूखे मन की फ़िज़ा में जो जिन्दा कर दे तबियत, पानी भर दे आँखों में .. की फिर से चमकने लगी है “उर्वी” – रास है ये -चुलबुली बारिश और चंचल मन का।



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