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- October 6, 2020
रेल
रेल की बोगी मानों घरों को खोलकर जोड़ दी गयी एक श्रृंखला होती है, जो एहसास कराती है की मंज़िल पर हम साथ ही पहुंचेंगे। हम जब ट्रेन की यात्रा पर होते हैं तो यह
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- October 3, 2020
बरसने लगूं बेपरवाह
ख़्वाबों की गलियों में टहलने निकली ही थी की अल्लहड़ बूंदों की तीखी आवाज़ सुन हड़बड़ाई आँखों ने द्वार जो खोले तो स्वागत हुआ उस नमी से जो भाप बनकर खिड़की पर बन फिसल रहे
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- October 2, 2020
कहां हैं वे फूल, वे किताबें कहां हैं?
एक शायर ने लिखा था, “अब के बिछड़े हम शायद ख्वाबों में मिले, जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिले “। दरअसल यह ग़ज़ल उस गुजिश्ता ज़माने की यादगार ग़ज़ल है, जब फूल खिलते
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- September 26, 2020
पेड़ों को सहलाती बारिश
रिमझिम के गीत सावन गाए कायनात को नहाते हुए देखना जितना सुखद है उतना ही सुहावना है बारिश के बाद का बंधा समा बारिश कि बूंद जैसे पत्तों के बदन पे लटके हुए मोती पेड की पत्तियों