Latest PostsView All
इंसानी वजूद
इंसानी वजूद में ना जाने कितने रंग के कितने ही धागे हैं जो अंदर ही अंदर आपस में उलझ-सुलझ कर
जो ऋतु वसंत नही हो पाई, वह ऋतु होने से चूक गई
वसंत जो ऋतु वसंत नही हो पाई, वह ऋतु होने से चूक गई है, उसके स्वभाव से अलग हो
मैं इतनी सार्वजनिक हो गई
मैं इतनी सार्वजनिक हो गई की मझे मेरे से बहार सब पहचानने लगे| क्या करूँ? वक़्त की कोई खाली अंगुली