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खत | यादों में भीगी एक नज़्म
हालात यूं हैं कि जब फोन पे आपकी आवाज सुनती हूं तो भर जाती हूं और आवाज उसी में दब जाती है
खुद को बचा लेना कितना ज़रूरी था
अपनी भी संभाल करनी होती है दूसरों को संभालते हुए कहीं खुद को नज़रअंदाज़ तो ना कर बैठे हम लोग
इनकी ‘चूं’ सुनने के लिए कहीं कान तरस न जाएं!
इनकी चूं -चूं आबाद रहे इन नन्ही जानों ने बिजली के ठन्डे तारों पर अपने पैर जमाना कैसे सीखा होगा?